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- उत्तराखंड

छांवदार पेड़ों की कमी के चलते बढ़ रही गर्मी

अप्रैल का महीना शुरू होते ही डोईवाला, देहरादून और आसपास के क्षेत्रों में तापमान तेजी से बढ़ने लगा है। लोग धूप से बचने के लिए पेड़ों की छांव तलाशने लगे हैं, लेकिन छायादार पेड़ों की कमी के चलते क्षेत्रवासी गर्मी से परेशान हैं। खास बात यह है कि ऐसे पेड़ों की कमी के चलते तापमान […]

अप्रैल का महीना शुरू होते ही डोईवाला, देहरादून और आसपास के क्षेत्रों में तापमान तेजी से बढ़ने लगा है। लोग धूप से बचने के लिए पेड़ों की छांव तलाशने लगे हैं, लेकिन छायादार पेड़ों की कमी के चलते क्षेत्रवासी गर्मी से परेशान हैं। खास बात यह है कि ऐसे पेड़ों की कमी के चलते तापमान में भी बढोतरी हो रही है। डोईवाला क्षेत्र के लोगों का कहना है कि पिछले कई वर्षों से गर्मी के मौसम में तापमान तेजी से बढ़ रहा है। जिससे देहरादून और इसके आसपास की आबो हवा तेजी से बदल रही है। पर्यावरणविदों का मानना है कि लोगों ने कुछ विशेष किस्म के पेड़ों का पौधरोपण बंद कर दिया है। इन विशेष पेड़ों से टकराकर गर्म हवाएं ठंडी हो जाती थीं और धरा को ठंडा रखने में सहयोग करती थीं। विकास की इस दौड़ में इस प्रकार के पेड़ अंधाधुंध काटे गए, लेकिन इन पेड़ों को दोबारा नहीं लगाया जा रहा है, जिससे वातावरण गर्म होता जा रहा है। पौधरोपण के नाम पर फलदार और शोदार पेड़ों को लगाकर संस्थाएं और क्षेत्रवासी अपनी पीठ थपथपा लेते हैं। पर्यावरणविद एवं वन विभाग के पूर्व पीसीएफ श्रीकांत चंदोला ने बताया कि अपनी छांव और नमी से धरती मां को प्रचंड गर्मी से संरक्षित करने वाले वृक्ष कहां गए। कई इलाकों में देसी आम, जामुन, अमलतास, पलाश, तुन, इमली, बबूल, बरगद, पीपल, पाकड़, गूलर, नीम, बकायन, कचनार, चीला, मौलश्री और पहाड़ी क्षेत्र में में बांज, मोरु, देवदार और मैदानी क्षेत्र में छतून के वृक्ष अब दिखाई नहीं पड़ते। इन्हें लगाया जाना मानव जाति के हित में है, जिनसे शुद्ध ऑक्सीजन तो मिलेगी ही, धरा भी ठंडी रहेगी।

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