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भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त का ऐतिहासिक बयान

हमारे ऊपर गम्भीर आरोप लगाये गये है इसलिए यह आवश्यक है कि हम भी अपनी सफाई में कुछ शब्द कहें। हमारे कथित अपराध के सम्बन्ध में निम्नलिखित प्रश्न उठते हैः(1) क्या वास्तव में असेम्बली में बम फेके गये थे, यदि हां तो क्यों ? (2) नीचे की अदालत में हमारे ऊपर जो आरोप लगाये गये […]

  • हमारे ऊपर गम्भीर आरोप लगाये गये है इसलिए यह आवश्यक है कि हम भी अपनी सफाई में कुछ शब्द कहें। हमारे कथित अपराध के सम्बन्ध में निम्नलिखित प्रश्न उठते हैः(1) क्या वास्तव में असेम्बली में बम फेके गये थे, यदि हां तो क्यों ? (2) नीचे की अदालत में हमारे ऊपर जो आरोप लगाये गये है, वे सही है या गलत ?
    पहले प्रश्न के पहले भाग के लिए हमारा उत्तर स्वीकारात्मक है, लेकिन तथाकथित चश्मदीद गवाहों ने इस मामले में जो गवाही दी है वह सरासर झूठ है। चूकि हम बम फेंकने से इन्कार नही कर रहे है। इसलिए यहां इन गवाहों के बयानो की सच्चाई की परख भी हो जानी चाहिए। उदाहरण के लिए, हम यहां बता देना चाहते है कि सार्जेण्ट टेरी का यह कहना कि उन्होने हममें से एक के पास से पिस्तौल बरामद की, एक सफेद झूठ मात्र है।, क्योकि जब हमने अपने आप को पुलिस के हाथों में सौपा तो हममें से किसी के पास कोई पिस्तौल न थी। जिन गवाहो ने कहा है कि उन्होने हमें बम फेंकते देखा था, वे झूठ बोलते है। न्याय तथा निष्कपट व्यवहार को सर्वांपरि मानने वाले लोगो को इन झूठी बातो से एक सबक लेना चाहिए। साथ ही हम सरकारी वकील के उचित व्यवहार तथा अदालत के अभी तक के न्याय संगत रवैये को भी स्वीकार करते है।
    पहले प्रश्न के दूसरे हिस्से का उत्तर देने के लिए हमें इस बमकाण्ड जैसी ऐतिहासिक घटना के कुछ विस्तार में जाना पड़ेगा। हमने वह काम किस अभिप्राय से तथा किन परिस्थितियों के बीच किया, इसकी पूरी एंव खुली सफाई आवश्यक है।
    जेल में हमारे पास कुछ पुलिस अधिकारी आयें थे। उन्होने हमें बताया कि लांर्ड इर्विन ने इस घटना के बाद ही असेम्बली के दोनो सदनो के सम्मिलित अधिवेशन में कहा है कि‘‘यह विद्रोह किसी व्यक्ति-विशेष के खिलाफ नही वरन सम्पूर्ण शासन व्यवस्था के विरूद्व था। यह सुनकर हमने तुरन्त भांप लिया कि लोगो ने हमारे इस काम के उदेश्य को सही तौर पर समझ लिया है।
    मानवता को प्यार करने में हमं किसी से पीछे नही है हमें किसी से व्यक्तिगत द्वेष नही है और हम प्राणि-मात्र को हमेशा आदर की नजर से देखते आये है। हम न तो बर्बरतापूर्ण उपद्रव करने वाले देश के कंलक है, जैसाकि सोशलिस्ट कहलाने वाले दीवान चमनलाल ने कहा है, और न ही हम पागल है, जैसाकि लाहौर के ‘ट्रिब्यून‘ तथा कुछ अन्य अखबारो ने सिद्ध करने का प्रयास किया है। हम तो केवल अपने देश के इतिहास, उसकी मौजूदा परिस्थिति तथा अन्य मानवेचित आकांक्षाओ के मननशील विद्यार्थी होने का विनम्रतापूर्वक दावाभर कर सकते है हमें ढोगं तथा पाखण्ड से नफरत है।

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