कुलदीप रावत देहरादून
देहरादून – राज्य विभाजन से पहले से ही उत्तराखंड में अधिकारियों की पोस्टिंग सजा के तौर पर देखी जाती रही है…लेकिन अलग राज्य उत्तराखंड बनने के बाद भी अधिकारियों की यह मानसिकता खत्म नहीं हो पा रही है…ताजा मामला पीसीएस अधिकारी गौरव चटवाल का भी सामने आया है जो युवा अधिकारी होने के बावजूद पहाड़ पर सेवा देने को लेकर असमर्थता जता चुके हैं।
उत्तराखंड में पीसीएस अधिकारी गौरव चटवाल का पहाड़ पर पोस्टिंग न लेने का कोई पहला मामला नहीं है इससे पहले भी कई आईएएस और पीसीएस अधिकारियों ने पहाड़ पर पोस्टिंग मिलने के बाद तैनाती नही ली है…दरअसल तबादलों को लेकर उत्तराखंड में अफसरों की पहली च्वाइस मैदानी जिले ही होते हैं ज्यादातर अधिकारी इन्हीं जिलों में तैनाती पसंद करते हैं… कई अधिकारी ऐसे हैं जो अपने कार्यकाल का अधिकतर समय मैदानी जिलों में ही बिताकर रिटायरमेंट तक पहुंचे हैं। खास बात यह है कि न केवल पीसीएस अधिकारी बल्कि कई आईएएस अधिकारी भी पहाड़ों की तरफ रुख करने को तैयार नहीं है..यह बात सही है कि उत्तराखंड में राजनेताओं की कमजोरी के चलते अफसरशाही हमेशा हावी रही है पिछली सरकार में भी एक मौका ऐसा आया जब तबादलों की सूची जारी होने के बाद कई आईएएस अधिकारियों ने नई तैनाती लेने से साफ इंकार कर दिया इसके बाद सरकार ने बैकफुट पर आते हुए सूची में बदलाव कर दूसरे आईएएस अधिकारियों को संबंधित नई तैनाती के लिए निर्देशित किया। उसी दौरान चर्चा रही कि पूर्व गढ़वाल कमिश्नर सीएस नपलच्याल को जब कुमाऊं कमिश्नर बनाया गया तो उन्होंने कुमाऊं जाने से साफ इंकार कर दिया.. जबकि आईएएस बृजेश कुमार संत भी नई तैनाती पर नही गए। यह भी बताया जाता है कि प्रमोशन के बाद आईएएस भास्करानंद और मंजुल जोशी ने भी पहाड़ का रुख नहीं किया। हालांकि कैबिनेट मंत्री अरविंद पांडे ऐसे अधिकारियों को लेकर सख्त रुख जताते हुए कहते हैं कि जो भी अधिकारी उत्तराखंड के पहाड़ी क्षेत्रों में तैनाती को सजा के रूप में देखता है उन्हें उत्तराखंड को छोड़ देना चाहिए साथ ही उन्होंने अधिकारियों की ऐसी सोच को दुर्भाग्यपूर्ण बताया।
रुद्रप्रयाग में तैनाती के कुछ ही दिनों बाद वापस लौट जाने वाले पीसीएस अधिकारी गौरव चटवाल को सरकार ने राहत देकर दूसरे कई अधिकारियों के लिए भी पहाड़ में न जाने के रास्ते खोल दिए हैं। इस से इस से साफ़ जाहिर होतो है कही ना कहीं अफसरशाही दबाव में है सरकार
