तिरुपति से पशुपतिनाथ तक लाल डोरा बनाने वाले क्षेत्र भारत से नक्सलवाद अब अंतिम चरण में है,। 21 मई को दंतेवाड़ा जिले में सुरक्षा बलों की नारायणपुर में हुई मुठभेड़ में सुप्रीम कमांडर यानी नक्सलियों का राष्ट्रीय महासचिव बसव राजू अपने सताइस साथियों के साथ मारा गया है। बसव राजू 1980 से नक्सलवाद से जुड़ा था।बताया जाता है कि वह 50 नक्सलियों की चार लेयर वाली सुरक्षा में रहता था और इसके ऊपर डेढ़ करोड़ का इनाम था ।1967 में माओवाद के नाम पर आरंभ हुआ नक्सलवाद 80,90,2000,2010 के दशक में छत्तीसगढ़, झारखंड, आंध्र प्रदेश, ओड़िशा के एक बड़े हिस्से में आतंक का पर्याय रहा है। जिसमें छत्तीसगढ़ के घने जंगलों में इनका राज रहा था। पुलिस अधिकारियों की यहां पद स्थापना होते ही रूह कांप जाती थी इतना ही नहीं पुलिस इन नक्सलियों के डर से अपनी बर्दी भी नहीं पहनते थे।लगभग आदी शताब्दी चले इस आंदोलन ने हजारों पुलिस अधिकारी शहीद कर दिए।कई आइपीएस अधिकारियों ने भी अपनी जान दी । छी रम घाटी में छत्तीसगढ़ की पूरी कांग्रेस पार्टी जिसमें महेंद्र कर्मा, नंदकुमार साय, विद्याचरण शुक्ल सहित 40 नेता एक ही हमले में मारे गए।
1967 में चारु मजूमदार, कीनू कन्याल,द्वारा चीन के माओवाद से प्रभावित हो कर भारत सरकार के खिलाफ सशस्त्र हिंसक आंदोलन खड़ा किया और उसकी जन्मभूमि थी नक्सलबाड़ी जो पश्चिमी बंगाल में है। आरंभ में यह लोग जमीन,जंगल, जंगली जातियों,ट्राइब्स,के अधिकारों की मांग कर ते थे। चारु मजूमदार और कन्याल ने अपनी जड़े पहले,पूर्व के बस्तर क्षेत्र में जमाई।फिर शनै शनै नक्सलियों ने पूरा एक क्षेत्र बना लिया जिसमें इन की ही सत्ता चलती है । मप्र के बालाघाट जिले, छत्तीसगढ़ के दांतेवाड़ा, जगदलपुर, चांपा, तेलंगाना का नलगोंडा,सूर्यपेठ, खम्मम, ओडिशा का कालाहांडी, झारखंड के कुछ हिस्सा को मिलाकर एक लालडोरा क्षेत्र बना लिया जिसमें लाखों आदिवासी लोगों को अपने हिंसक आंदोलन से जोड़ा, इतना ही नहीं इन नक्सलियों ने बड़ी मात्रा में हथियार,लैंड माइन्स,गोला बारूद भी चीन से हासिल किया।पूरे क्षेत्र में बन ठेकेदारों,सड़क निर्माण में कार्य कर रहे मालिक से प्रति वर्ष करोड़ों रुपए बसूल कर लिया। नक्सलियों ने पूरे लाल्दोरा को अपने दोहन साधन बना लिया था।ये लोग खनिज विभाग के ठेकेदारों से महीने की एक मुश्त रकम ऐंठते थे । शासकीय सेवा में लगे लोग भी तीस प्रतिशत राशि देते थे। अगर आनाकानी की तो मौत हो उनकी सजा थी। कौन ठेठेदार टेंडर जारी करेगा यह सब जगदलपुर, रायपुर,में बैठा प्रधान तय करता था । नक्सलियों का एक उद्देश्य था कि पूरे तंत्र को इतना डरा कर रखो कि शासन की नीतियों को क्रियान्वयन नहीं हो सके ।एक बार जन चौपाल लगा रहे एक कलेक्टर को अपह्त कर लिया। और उनको रिहा कर ने लिए शासन ने बकायदा फिरौती दी। कुछ गैर सरकारी संगठन भी इनकी आड़ में करोड़ों रुपए की सरकारी कार्यक्रम को दिल्ली में बैठे बैठे ही चला ती थी।नब्बे के दशक नक्सलियों का इतना जलजला हो गया कि ये लोग चुनावों को भी प्रभावित कर देते थे। राष्ट्रीय दल भी इनके सामने नतमस्तक थे। दिल्ली में भी इनकी एक लाभी थी जो इनको राजनीतिक संरक्षण देने का काम किया करती थीं। सीपीएम,सीपीआई
सीपीई माले फॉरवर्ड ब्लॉक, आरपीआई, का खुला संरक्षण था।इन नक्सलियों ने जंगलों में बड़े बड़े केंप बना लिए थे और अपनी अय्याशी के लिए भोले भाले आदिवासी महिलाओं को बड़े पैमाने पर रख रखा था नक्सलियों छद्म नाम पर पासपोर्ट बनवा लिया था और विदेश यात्रा करते थे। आदिवासियों को बकायदा वेतन दिया जाता था। नक्सली काफी पड़े लिखे थे और कई भाषाओं इंग्लिश, कन्नड़,तेलगु,हिंदी,बोलते थे।
केंद्र सरकार ने नक्सलवाद को लगाम लगाने के लिए बीएसएफ, सीआरपीएफ, सीआईएफएफ, आईटीबीपी,की सैकड़ों बटालियन भी लगाई लेकिन नतीजा नहीं निकला ।2014 भारतीय जनता पार्टी की मोदी सरकार ने नक्सलवाद को लेकर दीर्घ कालीन नीति बनाई और उसमें गृह मंत्री अमित शाह ने नक्सलवाद को समाप्त करने पर जोर दिया। 2024 में 380 नक्सलियों का सफाया हुआ।
अब जाकर नक्सलियों की चूल हिली है।21 मई को हुए एनकाउंटर में बसव राजू नमक एक करोड़ इनामी नक्सली मारा गया है। बसव राजू के बारे में बताया जाता है कि वह अभी फिलिपीन से लौटा था।अभी हिड़मा,देवा,सहदेव, नामक नक्सली,सुकमा घाटी में घिर गए हैं।
केंद्र सरकार ने दावा किया है कि 2026 तक नक्सलवाद भारत से समाप्त हो जाएगा।

