
जिस अम्बेडकरवाद ने दलित समाज को शिक्षित होने, संगठित रहने और संघर्ष करने की प्रेरणा दी, जिसके बल पर दलित युवाओं ने शिक्षा के क्षेत्र में अपनी पहचान बनाई और शासन-प्रशासन में अपनी उपस्थिति दर्ज की, वही अम्बेडकरवाद आज दलित युवाओं के बीच घृणा, द्वेष और हिंसा का पर्याय बनता जा रहा है। दलित नेतृत्व व्यक्तिगत स्वार्थों के लिए अम्बेडकर के सिद्धांतों को दाँव पर लगाने को तैयार है। विभिन्न सामाजिक संगठन अम्बेडकरवाद के नाम पर अपनी राजनीतिक जमीन तलाश रहे हैं। ये संगठन सत्ता को सर्वोच्च शक्ति बताकर दलित युवाओं के मन में सवर्णों और पिछड़ों के खिलाफ जहर बो रहे हैं। कभी संविधान को खतरे में बताकर, तो कभी समाज में असुरक्षा का भय पैदा कर, ये एक अराजक माहौल बना रहे हैं। इसका परिणाम यह हुआ कि जो बच्चा कभी कलम के सहारे बाबा साहब के सपनों को साकार करना चाहता था, वही युवा आज कलम छोड़कर तलवार और तमंचा थामे खूनी क्रांति की राह पर चल पड़ा है।
बाबा साहब का संदेश
डॉ. बी.आर. अम्बेडकर ने 26 नवंबर 1949 को संविधान सभा में अपने अंतिम भाषण में कहा था:
“अपने सामाजिक और आर्थिक लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए हमें निष्ठापूर्वक संवैधानिक उपायों का सहारा लेना चाहिए। इसका अर्थ है कि हमें खूनी क्रांति का रास्ता छोड़ना होगा। इसका अर्थ है कि हमें सविनय अवज्ञा, असहयोग और सत्याग्रह जैसे तरीके त्यागने होंगे। जब संवैधानिक उपाय उपलब्ध हों, तब असंवैधानिक तरीकों का कोई औचित्य नहीं है। ये अराजकता के व्याकरण के सिवा कुछ नहीं हैं, और जितनी जल्दी इन्हें छोड़ दिया जाए, हमारे लिए उतना ही बेहतर होगा।”
बदलते मायने और कारण
फिर क्या वजह है कि अम्बेडकरवाद के मायने दलित समाज में बदल रहे हैं? जिस समाज ने संवैधानिक रास्ते अपनाकर, कलम और वोट की ताकत से अपने सामाजिक-आर्थिक स्तर को ऊपर उठाया और सत्ता के शीर्ष तक पहुँचा, वही आज अचानक तलवार और गोली के सहारे अधिकार हासिल करने के लिए सड़कों पर उतर रहा है? संविधान में उनकी आस्था क्यों डगमगा रही है? कहीं यह उन साम्राज्यवादी ताकतों की साजिश तो नहीं, जो दलितों के विकास को रोकने के लिए उन्हें हिंसा की राह पर धकेल रही हैं—वे ताकतें जो सदियों से अन्याय और शोषण की पक्षधर रही हैं?
मशहूर शायर ने लिखा है
“लम्हों ने खता की थी, सदियों ने सजा पाई।”
इतिहास गवाह है कि जब भी किसी कौम ने हथियार उठाकर हिंसा की, उसकी भावी पीढ़ियों को भारी कीमत चुकानी पड़ी। यह बात उन सामाजिक और राजनीतिक संगठनों को समझनी होगी जो अम्बेडकरवाद को आदर्श बताकर शोषितों और वंचितों के नेतृत्व का दावा करते हैं और हर मंच पर संविधान की दुहाई देते हैं।
हिंसा का परिणाम: नक्सल आंदोलन का उदाहरण:
पिछले कुछ दशकों में हुए हिंसक आंदोलनों में नक्सल आंदोलन इसका जीवंत उदाहरण है। इस आंदोलन ने अपनी माँगों के लिए वोट की बजाय गोली को ताकतवर माना और हिंसा की राह चुनी। यह तरीका पूरी तरह असंवैधानिक था, भले ही उनकी माँगें जायज हों। परिणाम सामने है—उनकी माँगें कभी पूरी नहीं हुईं, लेकिन हजारों बच्चों के सिर से पिता का साया उठ गया, बहनों का सुहाग छिन गया, माँएँ अनाथ हो गईं, और बचे हुए लोग जंगल में छिपने को मजबूर हुए। यह साबित करता है कि लोकतंत्र में बुलेट नहीं, बल्कि बैलट प्रभावी होता है।
संवैधानिक रास्ते की मिसाल: कांशीराम
जिन्होंने अहिंसा और संवैधानिक रास्ते पर चलकर वोट को हथियार बनाया, वे सत्ता के शीर्ष तक पहुँचे। बहुजन समाज पार्टी के संस्थापक कांशीराम इसका उदाहरण हैं। उन्होंने सामाजिक परिवर्तन और आर्थिक मुक्ति के आंदोलन को संविधान के दायरे में रखकर, वोट की ताकत से उत्तर प्रदेश जैसे बड़े राज्य की सत्ता पर कब्जा किया।
सामाजिक और आर्थिक लोकतंत्र की आवश्यकता:
डॉ. अम्बेडकर ने कहा था कि राजनीतिक लोकतंत्र के बिना सामाजिक और आर्थिक लोकतंत्र अधूरा है। 26 जनवरी 1950 को उन्होंने चेतावनी दी थी कि यदि हम सामाजिक और आर्थिक समानता को नकारते रहे, तो असमानता के शिकार लोग राजनीतिक लोकतंत्र को नष्ट कर देंगे, जिसे संविधान सभा ने बड़े परिश्रम से खड़ा किया था। आज उनकी यह बात सत्य साबित हो रही है। असमानता से पीड़ित वर्ग लोकतांत्रिक व्यवस्था में विश्वास खो रहा है, जो उनके लिए उम्मीद की किरण थी। यह उनके लिए दुर्भाग्यपूर्ण है, क्योंकि सामाजिक और आर्थिक लोकतंत्र की सबसे अधिक जरूरत शोषित औरObject वंचित वर्ग को ही है।
आज का अम्बेडकरवाद
आज दलित नेतृत्व व्यक्तिगत स्वार्थों के चलते अंबेडकरवाद के मूल सिद्धांतों से खेल रहा है। हर सामाजिक संगठन इस विचारधारा का इस्तेमाल अपनी राजनीतिक रोटियाँ सेंकने में कर रहा है। “संविधान खतरे में है” या “दलित असुरक्षित हैं” जैसे नारों से युवाओं के मन में सवर्णों और पिछड़ों के प्रति घृणा भरी जा रही है। नतीजा? वह युवा जो कभी कलम के बल पर बाबासाहब का सपना पूरा करना चाहता था, आज तलवार और तमंचे उठा रहा है।
क्या यही था अंबेडकर का सपना ?
आज के तथाकथित अम्बेडकरवादी बाबा साहब के कथन को भूल चुके हैं। उन्हें सामाजिक और आर्थिक लोकतंत्र से कोई सरोकार नहीं रहा। वे सवर्णों और सामंतों के साथ राजनीतिक लाभ के लिए गठजोड़ कर रहे हैं। उन्हें लगता है कि उनकी व्यक्तिगत समृद्धि ही पूरे समाज की प्रगति है। जब तक ये तथाकथित अम्बेडकरवादी संविधान को शास्त्र मानकर इसके मूल्यों को आत्मसात नहीं करते, जब तक दलित समाज संवैधानिक अधिकारों की माँग एक नागरिक की हैसियत से नहीं करता, और जब तक शोषित वर्ग सरकार की जनकल्याणकारी योजनाओं के क्रियान्वयन में सजगता नहीं दिखाता, तब तक सामाजिक और आर्थिक लोकतंत्र स्थापित नहीं हो सकता। यदि यह स्थिति जारी रही, तो देश अपना संवैधानिक लोकतंत्र खो देगा।
साभार :- जाग्रत भारत
CREATE BY कपिल वर्मन

