
कपिल वर्मन
- प्राचीन ग्रीस (लगभग 508 ईसा पूर्व) में लोकतंत्र का आरंभ हुआ, लेकिन वोटिंग का अधिकार सिर्फ पुरुष भूस्वामियों तक सीमित था.
- लगभग सभी पुराने लोकतांत्रिक देश प्रारंभिक तौर पर केवल संपत्ति, वर्ग या लिंग के आधार पर वोटिंग की अनुमति देते थे
- भारत में भारत में 1919 के भारत शासन अधिनियम द्वारा पहली बार सीमित तौर पर कुछ महिलाओं को वोटिंग अधिकार मिले
विश्व भर में वोटिंग के अधिकार की यात्रा संघर्षों, आंदोलनों और सुधारों से भरी रही है। प्रारंभिक काल में ग्रीस, रोम और यूरोप समेत अधिकांश देशों में वोट का अधिकार सीमित वर्ग-अर्थ यानी संपत्ति, जाति, लिंग-तक रखा गया। अमेरिका में 1776 में भी केवल श्वेत पुरुष संपत्ति धारकों को यह अधिकार मिला था। 19वीं सदी के मध्य से अधिकार का दायरा सतत संघर्षों और सुधारों के कारण बढा़, जिसमें ब्रिटेन, फ्रांस, अमेरिका जैसे लोकतंत्रों में वंचित समुदायों, महिलाओं, दलितों और सामुदायिक तबकों ने अपने मताधिकार के लिए आवाज़ उठायी.
सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार की स्थापना :
19वीं और 20वीं सदी में मताधिकार का अधिकार व्यापक हुआ। न्यूजीलैंड 1893 में महिलाओं को मताधिकार देने वाला पहला देश बना, जबकि अमेरिका में 19वें संशोधन के बाद महिलाओं को अधिकार दिया गया। भारत में भारत में 1919 के भारत शासन अधिनियम द्वारा पहली बार सीमित तौर पर कुछ महिलाओं को वोटिंग अधिकार मिले, 1950 के बाद संविधान लागू होने पर 21 वर्ष की आयु के सभी नागरिकों को, और 1989 के बाद 18 वर्ष से ऊपर सभी नागरिकों को मताधिकार मिला। इसी तरह दक्षिण अफ्रीका में रंगभेद के अंत के बाद सार्वभौमिक मताधिकार लागू हुआ, और स्विट्ज़रलैंड ने 1971 में महिलाओं को राष्ट्रीय स्तर पर वोट अधिकार दिया.
महिला मताधिकार का सामाजिक प्रभाव :
महिलाओं को मताधिकार देने से समाज में नेतृत्व, भागीदारी और प्रतिनिधित्व का स्वरूप बदला. भारत में सरोजिनी नायडू, हीराबाई दादा, राजकुमारी अमृत कौर जैसी तमाम महिलाओं के प्रयासों के कारण 1951 के पहले आम चुनाव में महिलाओं को बिना भेदभाव के वोट देने का अधिकार मिला. विश्व भर के चुनावों में महिला मतदाताओं की संख्या और सक्रिय भागीदारी अब न केवल बढ़ी है, बल्कि लोकतंत्र की सशक्त बुनियाद बन गई है.
वोट चोरी : लोकतांत्रिक व्यवस्था पर सीधा हमला :
वोट चोरी सिर्फ किसी पार्टी के जीतने-हारने का मसला नहीं, बल्कि लोकतंत्र के मूलभूत ताने-बाने का हनन है। जब किसी लोकतांत्रिक देश में योजनाबद्ध तरीके से मतदाता सूची में गड़बड़ी, फर्जी वोटिंग अथवा वोटरों के नाम हटाए जाते हैं, तो यह देश की जनता के अधिकारों की खुली लूट है। हाल के वर्षों में भारत में विपक्ष द्वारा बार-बार वोट चोरी के आरोप लगाए गए—65 लाख वोटरों के नाम वोटर लिस्ट से हटाने, फर्जी वोटिंग, और चुनाव आयोग की पारदर्शिता पर सवाल उठे.
कांग्रेस, विपक्ष और नागरिक समूहों ने निष्पक्ष चुनाव, मतदाता पहचान की गारंटी और चुनावी प्रक्रिया में पारदर्शिता की मांग शुरू की। सुप्रीम कोर्ट तक मुद्दा पहुंचा, जहाँ चुनाव आयोग द्वारा वोटिंग लिस्ट में कटौती का मामला प्रमुखता से उठा. ये घटनाएं लोकतंत्र की विश्वसनीयता और जनता के भागीदारी के अधिकार पर गंभीर खतरा पैदा करती हैं।
एक व्यक्ति, एक वोट: लोकतंत्र की आत्मा :
लोकतंत्र में ‘एक व्यक्ति, एक वोट’ सिर्फ चुनावी प्रक्रिया नहीं, समाज के अंतिम पायदान तक शासन और प्रशासन में भागीदारी की गारंटी है। इसके जरिए आम नागरिक को विधायक, सांसद आदि अपने पसंदीदा जन प्रतिनिधियों को चुनने का अधिकारी मिला है। नागरिक का यह अधिकार केवल चुनाव जितने का साधन या वोटों का गणित नहीं, बल्कि लोकतंत्र की आत्मा और उसकी नैतिक शक्ति है.
वोट चोरी: लोकतंत्र के अस्तित्व पर खतरा :
अभी भारत सहित कई देशों में वोट चोरी के आरोप गहरा रहे हैं। जब सरकारें, राजनीतिक दल अथवा संस्थान राज्य या चुनाव जितने की नियत से वोट अधिकारों पर चोट करते हैं-जैसे, मतदाता सूची से नाम हटाना, गलत पहचान पत्र जारी करना, फर्जी वोटिंग, या संस्थानों की स्वतन्त्रता प्रभावित करना—तब यह लोकतंत्र की जड़ों पर आघात है. विपक्ष, नागरिक संगठनों और सुप्रीम कोर्ट तक वोट चोरी को लेकर मुद्दा उठाया गया है. भारत में वर्तमान स्थिति लोकतंत्र के लिए चेतावनी है, क्योंकि यह तानाशाही की ओर बढ़ने का संकेत है।
संविधान निर्माता की चेतावनी और डेनियल ओ’कॉमेल का संदेश :
भारत के संविधान निर्माता डॉ. अंबेडकर ने संविधान सभा में अपने अंतिम भाषण में कहा था कि”भारत में भक्ति या नायक-पूजा उसकी राजनीति में जो भूमिका अदा करती है, उस भूमिका के परिणाम के मामले में दुनिया का कोई देश भारत की बराबरी नहीं कर सकता । धर्म के क्षेत्र में भक्ति आत्मा की मुक्ति का मार्ग हो सकता है, परंतु राजनीति में भक्ति या नायक पूजा पतन और अंतत: तानाशाही का सीधा रास्ता है।”
आयरिश देशभक्त डेनियल ओ कॉमेल ने खूब कहा है, ”कोई पुरूष अपने सम्मान की कीमत पर कृतज्ञ नहीं हो सकता, कोई महिला अपने सतीत्व की कीमत पर कृतज्ञ नहीं हो सकती और कोई राष्ट्र अपनी स्वतंत्रता की कीमत पर कृतज्ञ नहीं हो सकता।” यह सावधानी किसी अन्य देश के मुकाबले भारत के मामले में अधिक आवश्यक है,.
साभार :- जाग्रत भारत
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