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“बाबा साहब को मानने से पहले, उनके विचारों को जानना ही सच्ची श्रद्धा

क्या सामाजिक और शैक्षणिक रूप से सबसे निचले पायदान पर खड़ा समाज हिंसक रास्ते अपनाकर अपने संवैधानिक अधिकार प्राप्त कर पाएगा? यदि कोई व्यक्ति या संगठन अपने मौलिक अधिकारों—जो जन्म से ही प्राप्त हैं, चाहे वे समानता, स्वतंत्रता, न्याय, या धर्म को स्वतंत्र रूप से मानने के अधिकार हों—के लिए संविधान में पूर्ण निष्ठा के […]

कपिल बर्मन

क्या सामाजिक और शैक्षणिक रूप से सबसे निचले पायदान पर खड़ा समाज हिंसक रास्ते अपनाकर अपने संवैधानिक अधिकार प्राप्त कर पाएगा?

यदि कोई व्यक्ति या संगठन अपने मौलिक अधिकारों—जो जन्म से ही प्राप्त हैं, चाहे वे समानता, स्वतंत्रता, न्याय, या धर्म को स्वतंत्र रूप से मानने के अधिकार हों—के लिए संविधान में पूर्ण निष्ठा के साथ संवैधानिक मार्ग अपनाता है, वही सच्चा भीम अनुयायी कहलाने का हकदार है। इसके विपरीत, जो लोग पाखंडी पंडितों की तरह धर्मशास्त्रों का पालन करने का ढोंग करते हैं, किंतु उनकी शिक्षाओं को नहीं मानते, या जो संविधान को सिर पर ढोने का दिखावा करते हुए उसकी गलत व्याख्या कर जनता को भ्रमित करते हैं और इसे रोजी-रोटी का धंधा बनाते हैं, क्या उन्हें अम्बेडकरवादी कहना उचित होगा? यह गहन चिंतन का विषय है।

धार्मिक स्वतंत्रता के संदर्भ में बाबा साहब ने संविधान के भाग तीन, अनुच्छेद 25(1) में स्पष्ट लिखा है: “लोक व्यवस्था, सदाचार, और स्वास्थ्य के अधीन रहते हुए, सभी व्यक्तियों को अंतःकरण की स्वतंत्रता और धर्म को स्वतंत्र रूप से मानने, आचरण करने, और प्रचार करने का समान अधिकार होगा।” फिर वे कौन लोग हैं, जो स्वयं को स्वयंभू घोषित कर बाबा साहब के संविधान से बड़ा साबित करने की कोशिश करते हैं? वे क्यों भोली-भाली जनता में संविधान के प्रति वैचारिक भ्रांति फैलाकर उसकी अवमानना करते हैं?

क्या ऐसे व्यक्ति या संगठन, जो संविधान की अवहेलना करते हुए अपने को भीम का सच्चा सिपाही होने का प्रमाणपत्र माथे पर चिपकाए घूमते हैं, उचित हैं? जो संसदीय लोकतांत्रिक व्यवस्था में अपने अधिकारों के नाम पर हिंसा को जायज ठहराते हैं, उन्हें आप क्या कहेंगे? मैं तो इसे अराजकता ही कहूंगा।

देश में न्यायपूर्ण समानता, स्वतंत्रता, और आपसी भाईचारा स्थापित कर सामाजिक, आर्थिक, और शैक्षणिक लक्ष्य प्राप्त करने के लिए संविधान निर्माता डॉ. भीमराव अम्बेडकर ने संविधान सभा में अपने अंतिम भाषण में प्रत्येक नागरिक से अपेक्षा की थी:

“प्रजातंत्र को केवल बाह्य स्वरूप में ही नहीं, बल्कि पूर्ण रूप से बनाए रखने के लिए हमें क्या करना चाहिए? मेरी समझ से, हमें सबसे पहले यह सुनिश्चित करना होगा कि अपने सामाजिक और आर्थिक लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए संविधान में पूर्ण निष्ठा के साथ संवैधानिक उपायों का ही सहारा लिया जाए। इसका अर्थ है कि हमें खूनी क्रांति का रास्ता त्यागना होगा। हमें सविनय अवज्ञा, असहयोग, और सत्याग्रह जैसे तरीकों को छोड़ना होगा। जब संवैधानिक उपाय उपलब्ध न हों, तब असंवैधानिक उपाय उचित लग सकते हैं, परंतु जहां संवैधानिक मार्ग खुले हों, वहां इन असंवैधानिक उपायों का कोई औचित्य नहीं है। ये तरीके अराजकता के व्याकरण के सिवा कुछ नहीं हैं, और जितनी जल्दी इन्हें त्याग दिया जाए, उतना ही हमारे लिए बेहतर होगा।”

बाबा साहब ने जिनके हाथों में कलम का हथियार थमाया था, उनके हाथों में तलवार सौंपने की साजिश कौन रच रहा है? कहीं लोकतंत्र का लबादा ओढ़े राजशाही भारत में अपने पांव तो नहीं पसार रही? जिन दलित, शोषित, और वंचित वर्गों को बाबा साहब ने संविधान के माध्यम से सामाजिक, आर्थिक, और राजनीतिक न्याय के साथ स्वतंत्रता और समानता का अधिकार सुनिश्चित किया था, क्या वही आज राजशाही को स्थापित करने में सहायक सिद्ध हो रहे हैं? जो लोग बाबा साहब के संविधान से इतर अपने मनगढ़ंत विधानों के जरिए जनता में असंतोष और घृणा परोस रहे हैं, वे क्या कर रहे हैं?

साभार :- जाग्रत भारत

CREATE BY कपिल वर्मन

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