
” राज सत्ता की चाहत या आर्थिक समृद्धि” ही सामाजिक संगठनों का गठन का कारण
“लोकतंत्र बचाओ से लेकर धर्म खतरे में है तक—नए संगठनों की राजनीति”
कुछ वर्षों से सामाजिक संगठनों की बाड़ से आ गयी है कोई संविधान की दुहाही देकर, तो कोई लोकतंत्र बचाओ के नारे से ,कोई हिन्दू धर्म खतरे में है तो कोई इस्लाम बचाओ, कोई आरक्षण बचाओ ,तो कोई आरक्षण हटाओ जैसे विचारों के आधार पर नित नये दिन सामाजिक संगठनों का गठन किया जा रहा है । ऐसे अधिकांश सामाजिक संगठन जनता में डर और घर्णा फैला कर द्वेष आधार पर अपनी राजनीतिक जमीन तलासते नज़र आते है ।
जितने संगठन बन रहे है उसी अनुपात में जातिय ,धार्मिक एवं नस्ल आधारित अन्याय, अत्याचार और शोषण बढ़ रहा है। जबकि होना चाहिए था कम । मेरा ऐसा ख़याल है कि यह सारा खेल, निजी राजनीतिक महत्वकांक्षा की पूर्ति के लिए एक सुनियोजित साजिश का हिस्सा है।
जैसे ही किसी सामाजिक संगठन की जनता के बिच लोकप्रियता बढ़ती है, वैसे ही वो संगठन किसी न किसी एक राजनीतिक दल से प्रभावित हो कर अपने सिद्धांतों एवं ‘संगठन की ताक़त’ को राजनीतिक आकाओं के चरणों में समर्पित कर, बदले में विधायक, सांसद बनने की उम्मीद करता है । तब संगठन के समर्थक अपने को ठगा सा महसूस करते है।
आज कल ये चलन दलितों ओर पिछड़ों में कुछ ज्यादा देखने को मिल रहा है। ऐसे सामाजिक संगठनों के लिए ‘जनता’ बली के बकरे के समान होती है जिसे अपने स्वाद के लिए कुर्बान किया जाता है। इनको देश और देशवाशियों से कोई लेना देना नहीं। इसे संगठनों से जनता को बचना चाहिए।
साभार :- जाग्रत भारत
CREATE BY कपिल वर्मन

